भारत में BJP RSS reservation ke khilaf होने का आरोप राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। खासकर SC, ST और OBC वर्गों के प्रतिनिधित्व, सरकारी नौकरियों में आरक्षित पदों और उच्च शिक्षा संस्थानों में वरिष्ठ पदों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। हालांकि BJP और केंद्र सरकार आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने के आरोपों से इनकार करती रही हैं, लेकिन उपलब्ध आंकड़े यह जरूर दिखाते हैं कि प्रतिनिधित्व और खाली आरक्षित पदों की समस्या अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष भर्ती व्यवस्था में SC के लिए 15%, ST के लिए 7.5% और OBC के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान है। ऐसे में सवाल उठता है कि आरक्षण का प्रावधान होने के बावजूद वरिष्ठ पदों और कुछ संस्थानों में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देता है?
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विश्वविद्यालयों में SC-ST-OBC प्रतिनिधित्व
केंद्रीय विश्वविद्यालयों से जुड़े उपलब्ध आंकड़े इस बहस को महत्वपूर्ण बनाते हैं। 2022 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल 1 कुलपति SC समुदाय और 1 कुलपति ST समुदाय से था, जबकि 7 कुलपति OBC समुदाय से थे। यानी कुल 9 VC इन तीन वर्गों से थे।
यह आंकड़ा यह साबित नहीं करता कि किसी विशेष राजनीतिक दल ने इन पदों पर जानबूझकर आरक्षण रोका, क्योंकि कुलपति की नियुक्ति सामान्य सरकारी नौकरी वाली आरक्षण प्रक्रिया से अलग हो सकती है। लेकिन यह जरूर सवाल खड़ा करता है कि देश की सामाजिक विविधता का उच्च शिक्षा के नेतृत्वकारी पदों पर कितना प्रतिनिधित्व है।


2025 में भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में SC, ST और OBC वर्गों के लिए हजारों teaching posts खाली होने की रिपोर्ट सामने आई। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 4,889 reserved teaching vacancies बताई गईं, जिनमें SC के 711, ST के 428 और OBC के 1,491 पद शामिल थे।
हाई कोर्ट में प्रतिनिधित्व
न्यायपालिका में भी प्रतिनिधित्व का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति में वर्तमान व्यवस्था सामान्य सरकारी नौकरियों की तरह SC-ST-OBC आरक्षण पर आधारित नहीं है। सरकार ने संसद में भी स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका में नियुक्तियां Collegium प्रक्रिया के माध्यम से होती हैं।
फिर भी उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2025 के बीच नियुक्त 715 हाई कोर्ट जजों में 22 SC, 16 ST और 89 OBC समुदाय से थे। इससे न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस जरूर मजबूत होती है।
आरक्षित पद खाली क्यों हैं?
सरकारी नौकरियों में backlog vacancies भी बड़ा मुद्दा है। केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में संसद में बताया कि 2016 से SC, ST और OBC के लिए 4.80 लाख से अधिक backlog vacancies भरी जा चुकी हैं। इसका मतलब यह है कि आरक्षित पदों को भरने के लिए सरकार द्वारा अभियान चलाए गए हैं, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि बड़ी संख्या में आरक्षित रिक्तियां कभी मौजूद थीं।


इसलिए BJP RSS reservation ke khilaf जैसे राजनीतिक आरोपों पर बहस करते समय दो अलग-अलग बातों को समझना जरूरी है—आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करने का आरोप और आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन में मौजूद कमियां। उपलब्ध सरकारी आंकड़े दूसरी समस्या यानी प्रतिनिधित्व और backlog vacancies की समस्या को जरूर दिखाते हैं।
निष्कर्ष
SC, ST और OBC वर्गों के लिए संविधान ने सामाजिक न्याय और समान अवसर की व्यवस्था को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। इसलिए यह सवाल लोकतांत्रिक रूप से उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ कितने लोगों तक पहुंच रहा है और वरिष्ठ संस्थानों में इन समुदायों का प्रतिनिधित्व कितना है।
साथ ही, BJP RSS reservation ke khilaf को एक स्थापित तथ्य की तरह पेश करने के बजाय इसे राजनीतिक आरोप के रूप में देखना अधिक तथ्यात्मक होगा। वास्तविक बहस इस बात पर होनी चाहिए कि आरक्षित पद समय पर क्यों नहीं भरते, उच्च संस्थानों में सामाजिक प्रतिनिधित्व कैसे बढ़ाया जाए और संविधान द्वारा दिए गए समान अवसर के अधिकार को व्यवहार में कैसे मजबूत किया जाए।



