उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से गौमाता की स्थिति Gaushala Funding लगातार चिंताजनक होती जा रही है। सरकार ने चुनाव के दौरान गौसेवा और गौसंरक्षण के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन अब वे वादे केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं। असली समस्या यह है कि सरकार गोशालाओं को मिलने वाले अनुदान पर कुंडली मारकर बैठी है। जिन पैसों से गोशालाओं में चारा, पानी और दवाइयों की व्यवस्था होनी चाहिए थी, वे राशि समय पर जारी नहीं की जा रही है। नतीजा यह है कि कई गौशालाओं में गायों के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा, जिससे वे कुपोषण और बीमारियों का शिकार हो रही हैं।
Gaushala Funding सड़क पर घूमती गायों को देखकर यह साफ महसूस होता है कि सरकार ने गौसंरक्षण के नाम पर केवल दिखावा किया है। मुख्यमंत्री जी ने सरकारी कागजों में सड़क पर घूमती गायों को “आवारा” की जगह “निराश्रित” कहकर स्थिति को अच्छा दिखाने की कोशिश की है, लेकिन इससे हकीकत नहीं बदलती। शब्द बदल देने से गायों की तकलीफें कम नहीं होंगी। उन्हें आश्रय, भोजन और देखभाल की जरूरत है, न कि दिखावटी भाषणों की।


कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में Gaushala Funding को प्राथमिकता दी गई थी। कांग्रेस सरकार ने अपने पांच साल के शासन में करीब 3000 करोड़ रुपये का अनुदान प्रदेशभर की गौशालाओं को दिया था। उस दौरान न केवल गायों की हालत बेहतर हुई थी, बल्कि साधु-संतों और गौशाला संचालकों ने भी सरकार के प्रयासों की सराहना की थी। कांग्रेस के समय में गोशालाओं में चारे और पानी की कोई कमी नहीं रहती थी। गायों के लिए चिकित्सा सुविधाएं भी बेहतर की गई थीं, जिससे कई बीमारियों पर नियंत्रण पाया गया था।
आज जब भाजपा सरकार सत्ता में है, तो गौमाता एक बार फिर परेशानी में है। कई गोशालाएं आर्थिक संकट से गुजर रही हैं, और संचालक सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं। कई जगहों पर तो गोशालाएं बंद होने की कगार पर हैं, क्योंकि उन्हें महीनों से अनुदान नहीं मिला। सरकार गौमाता के नाम पर वोट तो मांग लेती है, लेकिन जब सेवा करने की बारी आती है, तो चुप्पी साध लेती है।
प्रदेश की जनता भी अब यह समझने लगी है कि Gaushala Funding के नाम पर राजनीति करने और वास्तव में उनकी सेवा करने में बड़ा फर्क होता है। कांग्रेस सरकार ने यह दिखाया कि अगर नीयत साफ हो तो गायों की सेवा सही तरीके से की जा सकती है। अब भाजपा सरकार से यही उम्मीद है कि वह केवल भाषणों और प्रचार में नहीं, बल्कि जमीन पर काम करके दिखाए। गौशालाओं को जल्द से जल्द आर्थिक मदद दी जाए, ताकि गौमाता को भूख, बीमारी और लाचारगी से बचाया जा सके।
गाय भारतीय संस्कृति में माता के समान मानी जाती है। ऐसे में अगर वही गौमाता सड़कों पर भूखी-प्यासी घूमती दिखाई दे, तो यह समाज और सरकार दोनों के लिए शर्म की बात है। मुख्यमंत्री जी को चाहिए कि वे कागजी दावों से आगे बढ़कर वास्तव में गौसेवा के लिए ठोस कदम उठाएं, ताकि प्रदेश में गायों की दुर्दशा खत्म हो और लोग फिर से विश्वास कर सकें कि सरकार वास्तव में गौमाता की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है।




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